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It is not what we give, but how we give that matters

  • देयानि तृणपर्णानि शुद्धेन मनसाक्षिणे।
    तदभ्यासोचितत्यागः स्वमांसान्यपि चार्पयेत्॥
  • deyāni tṛṇaparṇāni śuddhena manasākṣiṇe|
    tadabhyāsocitatyāgaḥ svamāṁsānyapi cārpayet||
  • Whatever is given away, must be given away with pure intentions; even if the offerings are mere dried leaves. Such pure intentions are earned by painstakingly practicing giving away things dearest to one; even one’s own flesh.
  • दान चाहे किसी भी पदार्थ का हो परन्तु उस दान को शुद्ध अन्तःकरण से देना चाहिए, चाहे वह सामान्य तृण का दान भी क्यों न हो। इस प्रकार के त्याग का अभ्यास अपने प्रिय से प्रिय पदार्थों के दान से होता है। यहाँ तक कि यदि अपने मांस का दान करें तो उसे भी इसी भाव से अर्पण करना चाहिए।
  • – Vyāsa-subhāṣita-saṅgrahaḥ, 5

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